रजनी
उफ़्फ़ ये झुलसा देने वाली गर्मी ।
यूनिवर्सिटी के कॉमन रूम में बैठे- बैठे रजनी सोच रही थी कि आज ट्यूशन पढ़ाने नहीं
जाएगी । चिंकी कि परीक्षा भी समाप्त हो चुकी है, यदि एक
दिन पढ़ाने न भी गई तो क्या हो जाएगा ।
ट्रेन की भीड़ , ऊपर से यह गर्मी
। किसी तरह रजनी धक्के खाती ट्रेन से उतर पाई । उतरते ही चारो ओर अँधेरा छा गया । इतनी
गर्मी के बाद ये घने काले बादल कितने अच्छे लग रहे हैं । काले बादल मानों अभी बरस
पड़ेंगे । अचानक जैसे सारी थकान मिट गई और वह पढ़ाने चली गई । दो – तीन बच्चों को
पढ़ाकर रजनी अपने यूनिवर्सिटी का खर्च संभाल लेती थी । घर पहुँचकर उसने अपना बैग और
फ़ाइल एक तरफ सोफ़े पर पटक दिया और अपनी माँ के गले लगकर बोली – “ माँ आज मन बड़ा खुश है । एक अच्छी सी चाय मिलेगी ” ? माँ ने उसकी चोटी खींची और बोली – “ चाय पी- पीकर काली हो जाएगी और कोई
शादी नहीं करेगा तुझसे “ । रजनी बोली –“ क्या माँ तुम भी हमेशा एक ही रट लगाए रहती
हो । क्या शादी ही सबकुछ है ? नहीं ,
पहले मैं कुछ बन जाऊँ , फिर शादी कि बात कहना “। माँ बोली –
“ अरी क्या करेगी कुछ बनकर ? संभालना तो चूल्हा- चक्की ही है
। रजनी को गुस्सा आ गया । तुम संभालो रसोई
, मैं तो चली कहकर रजनी जाने लगी तो माँ ने हँसकर चाय की प्याली हाथ में थमा दी ।
“ माँ
, पापा कहाँ हैं” ? रजनी ने
पूछा । “अभी आए नहीं तुम्हारे पापा” , माँ ने जवाब दिया ।
रजनी सोच में पड़ गई । वह जानती थी कि ट्रेन में कितनी भीड़ होती है । वह हिसाब
लगाने लगी कि अभी पूरा डेढ़ साल बाकी है एम.ए की पढ़ाई खत्म
होने में और उसके बाद बी. एड के लिए एक और साल । ढाई साल के बाद ही कोई नौकरी कर
पाऊँगी । क्या तब तक पापा यूँ ही ट्रेन में धक्के खाते रहेंगे ? वो भी केवल थोड़े से पैसों के लिए । रजनी के आगे उसके पापा का करुणा से
भरा चेहरा घूम गया ।
जिस उत्साह के साथ उसने चाय माँगी थी वह आँसूओं के बूँदों के साथ उतनी ही
फीकी पड़ गई । देर रात तक रजनी को नींद न आई पर वह कोई हल भी न निकाल पाई । कई – कई
दिन पापा देर से घर लौटते थे और तब तक रजनी और उसकी माँ कई सारी आशंकाओं के साथ
दूर तक निगाहें गढ़ाए रहते ।
रजनी के पिता सरकारी नौकरी पर थे परंतु अब वे सेवा निवृत हो चुके थे । पेंशन
के पैसे इस महंगाई की मार झेलने मे असक्षम थे । इसी कारण वे एक छोटी- मोटी नौकरी
करते थे । उनकी उम्र हो चली थी और रजनी नहीं चाहती थी कि उसके पिता और तकलीफ उठाएँ
।
सुबह उठकर रजनी को भारीपन सा महसूस हुआ । सोचे लगी कि यूनिवर्सिटी न जाए , पर घर पर रहकर करेगी भी क्या ? माँ का रसोई में हाथ बटाएगी ?
नहीं- नहीं चली ही जाती हूँ , कहकर वह नहाने चली गई । मन
अशांत पड़ा था । भगवान से मन ही मन बोली – “ हे भगवान पापा को ठीक से रखना । मैं
चाहती हूँ कि वे कई सालों तक सेहतमंद रहे ताकि मैं अपनी पढ़ाई समाप्त कर कुछ बन
जाऊँ और उनके लिए कुछ कर पाऊँ , उनका सहारा बनूँ , वरना मेरी पढ़ाई और मेरा जीवन दोनों व्यर्थ हो जाएगा । अब मन थोड़ा शांत
हुआ , पर उत्साह न ला पाई । वैसे भी जब कोई रास्ता नज़र नहीं
आता तो हम भगवान को ही याद करते हैं ।
दिमाग में
अचानक अमित कि छवि आ गई । पर क्यों ? मैं क्यों सोचू
उसके बारे में ? नहीं , मैं भूल जाना
चाहती हूँ सब कुछ । कौन अमित ? उसका जीवन अलग है , उसकी कहानी अलग है और मेरा जीवन , मेरी कहानी अलग ।
मेरी कहानी में उसके लिए कोई जगह नहीं ।
अमित से रजनी की मुलाक़ात यूँ ही ट्रेन का इंतज़ार करते हुए एक दिन हुई थी ।
अमित का यूँ घूर-घूरकर उसकी तरफ देखना रजनी को परेशान कर रही थी । दो एक बार नज़रें
आपस में मिली पर उसमे रजनी की झुंझुलाहट थी । सिलसिला कई दिनों तक चला । रजनी का
गुस्सा भी बढ़ता गया पर वह कुछ न बोली । एक बार वह घर से सोचकर ही निकली थी कि आज
वह इस सिलसिले का खात्मा करके ही दम लेगी । वह आज खुद चाहती थी कि अमित उसे घूरे
ताकि आज वह सबके सामने दो बातें सुना सके । स्टेशन पहुँचकर देखा अमित पहले से ही
उसके इंतज़ार में खड़ा था । रजनी ने हिम्मत कर उसकी ओर देखा । अमित के चेहरे पर
मुस्कान नहीं थी बल्कि आग्रह था । रजनी चाहते हुए भी कुछ न बोल सकी । वह मन ही मन
सोचने लगी कि ये आजकल के लड़के भी बड़े बदतमीज़ होते हैं । शर्म लिहाज तो जैसे उनमें
है ही नहीं ।
गर्ल्स कॉमन रूम में लगे शीशे में अपने आप को देखकर उसे लगा जैसे गर्मी के
कारण चेहरे पर एक कालीख सी पड़ गई है । उसे लगा जैसे चेहरे पर कुछ लगाना चाहिए वरना
सच में वह साँवली पड़ जाएगी । शीशा एक तरफ
से थोड़ा टूटा हुआ था , पर कब टूटा ? कल तक तो ठीक था
। जया बोली अरे पगली ये तो कई महीनो से टूटा हुआ है । लगता है आज पहली बार तूने
शीशे को ध्यान से देखा है । रजनी को भी लगा जैसे आज का दिन कुछ अजीब सा ही है ।
रविवार का दिन था पर न जाने क्यों उसे घर पर
रहना अच्छा नहीं लग रहा था । पहले तो वह इसी रविवार का इंतज़ार करती थी । सारा दिन
ऐसे ही बीत गया पर हाँ आज उसने चेहरे पर बेसन से बना उबटन लगाया था ।
सोमवार की सुबह न जाने क्यों एक ताज़गी सी महसूस होने लगी । स्टेशन पर खड़ी
रजनी जानती थी कि अमित थोड़ी दूरी पर खड़ा उसे देख रहा होगा । ट्रेन आती दिखी । आज
पहली बार रजनी का दिल ट्रेन की आवाज़ के साथ ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा । उसे लगा अमित को देखे बिना वह नहीं जा सकती ।
शर्म आ रही थी पर फिर भी ट्रेन में चढ़ते
हुए उसने पीछे मुड़कर देख ही लिया । हमेशा की तरह भीड़ में दबी रजनी को सन्नाटे ने
जैसे घेर लिया । शायद इन्हीं चार पलों में
उसकी खुशियाँ सिमट कर रह गई थी । अपने आपको कोसने लगी कि काश वह थोड़ा इधर-उधर भी
देख लेती तो शायद अमित दिख जाता । अगले दिन उत्साह अपनी चरम पर थी । आज रजनी थोड़ा
सज- सँवरकर निकली थी । शायद अमित के लिए ।
उसे अपने आप से ही शर्म आने लगी थी । स्टेशन पर पहुँचते ही अमित को वहाँ न पाकर वह
इधर –उधर देखने लगी । एक पल तो लगा कि
अमित कहीं छुपकर ये जानने की कोशिश तो नहीं कर रहा है कि मैं उसे ढूँढती हूँ या
नहीं । ऐसा अगर हो भी तो क्या हुआ ? मैं तो उसे ढूँढ
ही रही हूँ । उस दिन भी अमित उसे नहीं दिखा पर उत्साह बरकरार थी । इस तरह पूरा
हफ्ता और फिर पूरा महीना बीत गया । अमित का आना बंद हो गया था । रजनी संभलना चाहती
थी पर कुछ था जो खो गया था । अब उसका न तो पढ़ने में जी लगता और न किसी और काम में
। सोचने लगी कि शायद लफंगा था , मिल गई होगी कोई दूसरी ।
आर्थिक तंगी इतनी न थी कि जरूरते पूरी न हो सके पर रजनी समझती थी कि पापा
के पास इतनी पूँजी नहीं है कि उसकी शादी धूम-धाम से कर सके । उसका मन कभी-कभी
दुखता था पर वह जानती थी कि वाहर्याडंबरों के लिए उसके जीवन में कोई जगह नहीं है
और इसका उसे कोई दुख नहीं क्योंकि ये सब तो वह पापा से पाना नहीं बल्कि पापा को
देना चाहती है । मन का कोना कोना पापा के प्यार और ख़यालों से भरा था पर उसी मन के
किसी कोने में एक छोटी सी जगह अमित ने शायद ले ली थी ।
पूरे एक महीने के बाद आज अमित उसे दिखा , वहीं उसी
जगह । रजनी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा । दोनों ने आपस में कभी बात नहीं की पर फिर भी
रजनी उससे पूछना चाहती थी कि इस तरह से तकलीफ देने का अधिकार उसे किसने दिया ।
अपने आँखों की चमक वह छुपा न पाई , पर ट्रेन आ गई और उसे
जाना पड़ा । अमित ट्रेन के दूसरे कमरे में चढ़ता भी है या नहीं वह नहीं जानती । ज़हन
में पिता के लिए कुछ करने की उत्कंठा के साथ-साथ अमित का खयाल जीवन में उत्सुकता
भरने लगी थी ।
अमित
को रजनी का कितना खयाल था वह नहीं जानती थी पर वह हर वक्त अमित के ख़यालों में खोई
रहने लगी । मन भी कैसा पागल है , जिसे जानता तक नहीं उसके लिए
न जाने कितनी कल्पनाएं करने लगता है । अपनी सहेली जया के साथ अमित के बारे में
बातें करना उसे बहुत अच्छा लगने लगा ।
पापा आज बहुत सारी मिठाइयाँ ले आए थे । हर महीने
वेतन मिलने पर पापा बहुत सारी मिठाइयाँ ले आते हैं । खाने के बाद मिठाई देते हुए
पापा ने कहा कि पढ़ाई के लिए किसी चीज़ कि ज़रूरत हो तो माँग ले और यदि ट्यूशन पढ़ाने
से अपनी पढ़ाई में असुविधा हो तो ट्यूशन पढ़ाना छोड़ दे । माँ बोली – “ इतने कम पैसों
के लिए तुम दिन-रात मेहनत करते हो और फिर इतने सारे पैसे मिठाई पर खर्च कर देते हो
। इससे भला तुम्हें कहाँ का लाभ हो जाता है “? रजनी ने हामी भरी
। पापा बोले – “ छोड़ दूँगा नौकरी , पहले बिटिया पढ़-लिख ले ।
पापा
की यह बात उसके कानों में गूँजने लगी । मन
ही मन रजनी अपने-आप को कोसने लगी । सोचने लगी कि आखिर वह चाहती क्या है ? दो नावों पर पाँव रखकर कभी मंज़िल पाई भी जाती है ?
नहीं वह ऐसा कुछ नहीं करेगी जिससे वह सपना टूट जाए जो उसने पापा के लिए देखा है ।
माता-पिता अपनी संतान के सुख के लिए अपना सर्वस्व त्याग देते हैं तो संतान क्यों
स्वार्थी हो जाता है । यदि उनके लिए रजनी ही सब कुछ है तो रजनी के लिए वे ही सब
कुछ क्यों नहीं हो सकते । महीने के अंत
में आर्थिक तंगी से जूझती माँ को रसोई के डिब्बों में दस-बीस रुपये ढूँढती , लगभग खाली गुल्लकों को तोड़ती देख चुकी है वह । वह अपने आप को बहुत छोटा महसूस करने लगी ।
अपनी उम्र की स्वाभाविकता के अनुरूप रजनी का अमित की ओर आकर्षित होना
स्वाभाविक ही है परंतु कभी-कभी हमें परिस्थितियों से समझौता करना पड़ता है । रजनी
इसे समझौता नहीं , कर्तव्य भी नहीं बल्कि अपने पापा
के लिए प्यार का नाम देना चाहती है । वह सब-कुछ भुलाकर नया जीवन शुरू करना चाहती
है जिसमे अमित के प्रेम के लिए कोई स्थान नहीं है । अमित भला और सुंदर दिखता है ।
शायद भावी जीवन में और अच्छा दिखेगा । क्या करता है अमित ?
अभी पढ़ता है या कोई नौकरी करता है ? कहीं खुद का कोई बिज़नेस
तो नहीं करता ? खैर मैं यह सब क्यों सोचूँ ?
आज रजनी का किसी शांत सी जगह जाकर बैठने का मन
है , फिर सोचती है कि नहीं , यदि मैं शांत सी जगह जाऊँगी
तो अमित के ख़यालों से दूर नहीं जा पाऊँगी । मुझे सबके बीच भीड़ में ही रहना है । वह
कभी अमित से मिली ही नहीं , फिर उसे भूलने के लिए रजनी को
इतनी मेहनत क्यों करनी पड रही है ? कहीं इसी को “ लव एट
फ़र्स्ट साइट “ तो नहीं कहते । नहीं-नहीं ऐसा न हो । सोचने
लगी कि भगवान करे अमित अब कभी उसे कहीं भी
दिखाई न दे ।
आज यूनिवर्सिटी के लिए स्टेशन पर जाने से पहले ही उसने निश्चय कर लिया था
कि वह अमित का खयाल भी नहीं करेगी । ट्रेन की आवाज़ सुनते ही उसका निश्चय डगमगाने
लगा । मन जैसे भँवर में फँस गया था । उसका मन जैसे दिमाग पर हावी हो गया था । उसे
देखना ही है कि अमित उसके इंतज़ार में खड़ा है या नहीं । ट्रेन में चढ़ते हुए जैसे
बिजली सी कौंध गई और अनायास ही वह मुड़ी । आज पहली बार अमित कि आँखों से उसकी आँखें
मिली । आज उसकी आँखों में गुस्सा नहीं बल्कि निश्छल प्रेम था। आज पहली बार आँखों
ही आँखों में उसने अमित से बात कर ली थी । कई सवाल पूछ लिए थे और शायद अमित ने भी
कोई जवाब ढूँढ लिया था । न चाहते हुए भी वह अमित से जुडने लगी ।
अपनी सहेली जया से आज उसने जी भर बातें की , जी भर रोई
। जया कहती है कि – “ अरे पगली , अमित
तुझे सचमुच चाहता है , तभी तो रोज़ एक टुक तुझे देखने आता है
। ऐसा कहाँ लिखा है कि अपने सपनों को पूरा करने के लिए हम प्यार नहीं कर सकते । हो
सकता है कि मंज़िल को पाने में अमित अंत तक तेरा सहारा बनें । सफर में अगर कोई
हमसफर साथ हो तो सफर और आसान हो जाता है “। उसे जया की बातें अच्छी लग रही थी । चाय
में चीनी तो डल ही गई थी । अमित को भुलाने की चेष्टा में वह और अधिक उसके करीब आती
गई ।
यह जानने के लिए कि अमित स्टेशन से वापस चला जाता है या कोई दूसरी ट्रेन
पकड़ता है , जया ने तय किया कि आज वे ट्रेन पर नहीं चढ़ेंगी
। रजनी के मना करने पर भी जया नहीं मानी । अमित रोज़ की तरह वहीं खड़ा था । जया ने
कई बार अमित की ओर देखा । वह भी उन्हें घूरता हुआ दिखा । अमित सचमुच बहुत आकर्षक
दिखता है । जया बोली –“ अगर तुझे पसंद ना हो तो मैं अमित को अपना जीवन साथी बनाने
को तैयार हूँ “। रजनी ने गुस्से से जया की ओर देखा और फिर दोनों ज़ोर-ज़ोर से हँसने
लगीं । ट्रेन आती दिखी तो रजनी की साँस मानों रुक गई । ट्रेन चली गई । जया ने रजनी
को कसकर पकड़ रखा था । उन्हे खड़ा देख अमित पहले तो हिचकिचाया पर फिर एक जगह बैठ गया
। जया ने बताया कि अमित बैठा हुआ है । रजनी को वहाँ खड़े रहना अटपटा लग रहा था ।
सोचने लगी कि पता नहीं अमित उसके बारे में क्या सोच रहा होगा । क्या पता कि वह
उसके ही लिए आता है या नहीं । जया को लगा कि अब उसे दोनों के बीच से चले जाना
चाहिए और रजनी से अगली ट्रेन से यूनिवर्सिटी आ जाने को कहकर वह चली गई ।
अमित बिलकुल रजनी के करीब था । रजनी का दिल
ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा । वह भाग जाना चाहती थी । दोनों इधर-उधर देखने लगे , किसी से कुछ न बोला गया । चुप्पी तोड़ते हुए अमित बोला –“ मैं आपके बारे में सब जानता हूँ , आपका नाम भी ।
मैं नहीं चाहता कि कोई हमे ऐसे देखे क्योंकि इसमे आपकी बदनामी हो सकती है । मुझे
इंडियन आर्मी में नौकरी मिली है और मैं आज रात की ट्रेन से कानपुर के लिए रवाना हो
रहा हूँ । अब तो छह महीनों के बाद ही आपसे मुलाक़ात होगी । पिछले कुछ दिनों से मैं
यह खत लिए घूम रहा हूँ पर हिम्मत नहीं पड़ी कि आपको कैसे दूँ । यदि आप आज यहाँ न
रुकती तो मेरे माता-पिता कुछ ही दिनों में आपके घर जाकर आपके घरवालों से मिलते “ ।
खत और एक रंगीन कागज़ पर लिपटा एक छोटा सा तोहफा रजनी को देते हुए अमित ने यह कहकर
कि आज का दिन उसके लिए सबसे यादगार दिन है , वह चला गया ।
रजनी उसे जाते हुए दूर तक देखती रही । एक अजीब सी शांति थी और अमित के लिए प्यार
के साथ-साथ श्रद्धा भाव की अनुभूति हो रही थी । अमित आकर्षक होने के साथ-साथ एक
अच्छा इंसान भी है । आँखों से ओझल होने से पहले अमित ने एक बार उसे मुड़कर देखा था
।
अजीब सी दुविधा में थी वह । समझ नहीं पा रही थी कि अमित को पा लेने के लिए
खुश हो या छह महीनो तक उसे न देख पाने के कारण दुखी हो । उसे किसी तरह यूनिवर्सिटी
पहुँचकर जया से मिलना है और उसके कंधे में सर रखकर जी भरकर रोना है । रजनी अमित को
दिलो जान से चाहने लगी थी । अब उसे लगने लगा कि ज़िंदगी खूबसूरत है और प्यार ज़िंदगी
में रंग भर देता है ।
शादी व्याह की बातें वह अपने जहन में नहीं लाना चाहती । अभी तो उसे मन
लगाकर पढ़ना है , अच्छी सी नौकरी करनी है ,
एक मकान बनवाना है ताकि माँ और पापा को किराए के मकान में और न रहना पड़े और अमित
उसके साथ हो तो रास्ते और आसान हो जाएँगे ।
रात को खाना खाकर वह अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी । अब वह बिलकुल अकेली थी , कोई बुलाने वाला न था , कोई देखने वाला न था , कहीं जाने की जल्दी नहीं थी । अब बस वह थी और अमित का दिया वह खत था जिसे
कभी वह हाथ में लेती तो कभी तकिये के नीचे रख देती और सोचती कि अगर अभी पढ़ लिया तो
सारी उत्सुकता खत्म हो जाएगी । वह इस उत्सुकता को लेकर कि खत में क्या लिखा होगा , छह महीने गुजारना चाहती थी । अमित के खयाल भर से वह रोमांचित हो उठती ।
यह खत उसके लिए आने वाले छह महीनो का सहारा था । रात के बारह बजे थे । अब उससे और रहा नहीं गया ।
उसने खत को खोला पर उसमे केवल चंद पंक्तियाँ ही लिखी हुई थी । उसे लगा था कि खत
में बहुत सारी बातें लिखी हुई होगी । उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जिसका घूरना उसे
कतई पसंद नहीं था आज वह उसके मन में बसा हुआ है । खत में लिखा था .......... प्रिय
रजनी , मेरा नाम अमित है । मुझे नहीं पता कि तुम मेरे बारे
में क्या सोचती हो पर मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ । तुम्हारी सहेली ने स्टेशन
पर कई बार तुम्हें तुम्हारे नाम से पुकारा इसीलिए मैं तुम्हारा नाम जान पाया ।
मुझे ‘इंडियन आर्मी’ में नौकरी मिली है
और मैं आज शाम को कानपुर के लिए रवाना हो रहा हूँ । अब तो छह महीनों के बाद
लौटूँगा । मेरे माता-पिता को मैंने तुम्हारे बारे में बता दिया है । वे शादी से
पहले प्रेम करने में विश्वास नहीं करते और मैं भी । मैं तुम्हें अपनी प्रेमिका
नहीं बल्कि जल्द से जल्द अपनी पत्नी बनाना चाहता हूँ । लौटते ही मैं अपने
माता-पिता के साथ तुम्हारे घर तुम्हारा हाथ माँगने आऊँगा । मेरा मोबाइल नंबर लिख
रहा हूँ । तुम्हारे फोन का बेसबरी से इंतज़ार है । तुम्हारा अमित ।
सब कुछ जैसे थम गया हो , समय का पहिया , साँसों का चलना , दिल का धड़कना सब कुछ । रजनी कहीं
खो गई । वह चिल्लाकर रोना चाहती थी । सुबह तक निस्तेज बिस्तर पर पड़ी रही । अगली
सुबह भी उससे उठा न गया , मानो कुछ समाधान करके ही बिस्तर से
उठेगी । माँ के बुलाने पर भी जब कोई हरकत न कर पाई तो माँ को आशंका हुई । देखा तो
बदन बुखार से ताप रहा था । डॉक्टर को बुलवाया गया ।
माँ
ने आज उसे अपने हाथों से खाना खिलाया । पापा तो दफ्तर ही नहीं गए । पहले तो उसने
माँ और पापा दोनों को उसे अकेला छोड़ देने को कहा पर थोड़ी देर के बाद अपने पापा को
बुलाया और कहने लगी कि-“ पापा क्या आप थोड़ी देर मेरे पास बैठ सकते हो”? पापा ने कहा –“ अरी मेरी गुड़िया , मैं तो सारी उम्र
तेरे पास बैठ सकता हूँ”। रजनी पापा की ओर करुणा भरे सजल नेत्रों से देखते हुए पूछा
–“ पापा आप मुझसे कितना प्यार करते हो”? पापा को लगा कि
बिटिया किसी परेशानी से गुज़र रही है । उन्होने जवाब दिया – “ मेरा जीवन तेरे ही
लिए है बेटा । मैं और तेरी माँ , तेरे बिना कुछ नहीं । हमारी
दुनिया तुझपर ही आकार खत्म होती है” ।
रजनी
की आँखों से आँसू बहने लगे । वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी , पर इन आँसुओं ने उसके जीवन के सभी उलझनों को धो डाला था। अगली सुबह उठकर , नहा-धोकर एक नए उत्साह लिए अपने माँ और पापा के साथ नाश्ता कर युनिवर्सिटी
के निकली । एक शांत सी जगह बैठकर उसने अमित के मोबाइल पर फोन किया । अमित ने फोन
उठाया और कहा- “ रजनी , मैं जनता था कि
तुम ज़रूर फोन करोगी । मैं तुम्हारे फोन का इंतज़ार कर रहा था” । कुछ देर तक कोई
जवाब न पाकर अमित ने पूछा –“ तुम रजनी ही हो न” ? रजनी ने कहा – “ सबसे पहले आप मुझे माफ करें ।
मुझे आपसे वह खत लेना ही नहीं चाहिए था । मैंने आपका खत पढ़ा । आपको गलतफहमी हुई है
। मैंने आपको कभी उस नज़र से नहीं देखा । मेरे जीवन का मकसद केवल शादी कर अपना घर
बसाना नहीं है बल्कि मुझे अपने पैरों पर खड़ा होकर अपने माता- पिता का सहारा बनना है । आप बहुत अच्छे इंसान हैं । इससे अधिक
मेरे मन में आपके लिए कोई खयाल नहीं है “।
रजनी
उदास थी पर दुखी नहीं ।